साई बाबा का आवेदन शंकराचार्य के नाम
व्यंग्य
माननीय शंकराचार्य महोदय
वाराणसी
विषय- मूर्ति स्थापना एंव पूजन की वर्जना हेतू धन्यवाद ज्ञापन
महोदय
भारत के प्रमुख धार्मिक सांसद होने के नाते मेरे जैसे फकीर की प्रार्थना पर ध्यान दें । मुझे श्रीमान के द्वारा प्रेषित एक नोटिस मिली है जिससे ज्ञात हुआ है कि आपकी संसद ने मुझे मंदिरों से बेदखल कर दिया है। आपकी संसद ने अध्यादेश जारी किया है कि किसी भी मंदिर में मेरा पूजन नहीं किया जायेगा। मैं आभारी हूं । आपने वही किया है जो मैं कहता रहा था । आपके इस कार्य की सराहना करता हूं तथा आपके लिए ईश्वर से प्रार्थना करता हूं । प्रार्थना करने का हक तो मुझे हासिल है ही क्योंकि इस बाबत किसी भी प्रकार का पत्र व्यवहार श्रीमान की ओर से नहीं किया गया है। यदि आप स्पष्ट कर सकें कि मैं हिंदू भगवान से प्रार्थना करूं कि मुसलमान अल्ला से तो कृपा होगी ।
मैं श्रीमान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं कि कम से कम भारत भूमि पर रहने का हक मुझे आपने दिया है। आप सर्व शक्तिमान हैं । आप चाहते तो मुझे देश निकाले की सजा भी दे सकते थे । आखिर आप स्वतंत्र भारत के शंकराचार्य है। महोदय, मैं उन दिनों भारत में सक्रिय था जब यहां अंग्रजों का राज था । मैने वह दौर देखा है जब ंिहंदू और मुसलमान एक साथ मिलकर देश की आजादी के लिए लड़ रहे थे । मैं तो फकीर आदमी हूं । गांव-गांव , गली-गली भटकता रहता था । किसी के घर का दाना मिल जाता ले जाकर पकाता और खाकर सो जाता । उन दिनों मुझे यह ख्याल ही नहीं आया कि मैं हिंदू हूं या मुसलमान । मैने श्रद्वा और संतोष से जीवन जीने के लिए लोगों से आग्रह किया । मुझे पता नहीं था कि आपके रूप में मेरा इतना बड़ा हितैषी इस भारत भूमि पर पैदा होगा । मैं उन सभी धर्म-संासदों का भी आभारी हूं जो अखाड़े के नाम से जाने जाते हैं । इन अखाड़ों ने अपना कीमती समय निकाला और मुझ जैसे नाचीज पर बहस की इसके लिए मैं तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूं । मैने सुना है कि समाज में दुराचार अपने चरम पर है। अकेली लड़की का घर से निकलना कठिन हो रहा है। आप सभी अखाडि़ये सांसदों ने इसके लिए भी जरूर जनचेतना अभियान चलाया होगा । आपने कम से कम हिंदू समाज को दुराचार के विरूद्ध; अवश्य ही चेताया होगा। उसकी खबर मुझ जैसे पाखंडी को नहीं मिली । राजनीतिक भ्रष्टाचार भी अपने चरम पर है। जनचेतना भ्रमित है । आप संतों ने अवश्य ही इसे संज्ञान लिया होगा । जनचेतना फैलाने और उसे सुमार्ग पर लाने का प्रयत्न अवश्य ही किया होगा । आखिर जिस देश का अन्न आप बिना उपजाये खा रहे हैं । जिस देश की माटी में बिना पसीना बहाये रह रहे हैं । जिस समाज के चढ़ावे पर जिंदा हैं । उस समाज के प्रति इतने कत्र्तव्य तो आपको याद ही होंगे ।
महोदय , आजीवन मैं नहीं जान सका कि मेरा धर्म मानवता के अलावा भी कोई है । आपने ज्ञात कर लिया । मैं हैरान हूं कि अचानक आपको मेरे प्रति इतना स्नेह कैसे उमड़ पड़ा । आपने मेरे आचार-विचार , आहार-विहार सब पर शोध कर डाला । यह शोध यदि इष्र्यावश है तो श्रीमान आपको सूचित कर दूं कि मैने कभी संचय की प्रवृति को प्रश्रय नहीं दिया । मेरे मंदिरों में जो अक्षय कोष जमा हो रहे हैं । उनके प्रति मेरी जिम्मेवारी नहीं है। मैने अपने जीवन में भिक्षावृति की । आज की सामग्री भी कल के लिए नहीं रखी।
मैं देश की सरकार के प्रति भी आभार व्यक्त करता हूं जो तमाशबीन है। राजनीतिक संसद से भी बड़ी धर्म संसद बन गई है । अंत में, सभी अखाडि़ये धर्मसांसद देश में फैले तमाम अंधविश्वासों और समस्याओं के प्रति भाी इतनी एकता दिखायेंगे इसी आशा के साथ ।
आपका शुभचिंतक
साईंनाथ
शशिकंात सिंह ’शशि’
skantsingh28@gmail.com
7387311701
व्यंग्य
माननीय शंकराचार्य महोदय
वाराणसी
विषय- मूर्ति स्थापना एंव पूजन की वर्जना हेतू धन्यवाद ज्ञापन
महोदय
भारत के प्रमुख धार्मिक सांसद होने के नाते मेरे जैसे फकीर की प्रार्थना पर ध्यान दें । मुझे श्रीमान के द्वारा प्रेषित एक नोटिस मिली है जिससे ज्ञात हुआ है कि आपकी संसद ने मुझे मंदिरों से बेदखल कर दिया है। आपकी संसद ने अध्यादेश जारी किया है कि किसी भी मंदिर में मेरा पूजन नहीं किया जायेगा। मैं आभारी हूं । आपने वही किया है जो मैं कहता रहा था । आपके इस कार्य की सराहना करता हूं तथा आपके लिए ईश्वर से प्रार्थना करता हूं । प्रार्थना करने का हक तो मुझे हासिल है ही क्योंकि इस बाबत किसी भी प्रकार का पत्र व्यवहार श्रीमान की ओर से नहीं किया गया है। यदि आप स्पष्ट कर सकें कि मैं हिंदू भगवान से प्रार्थना करूं कि मुसलमान अल्ला से तो कृपा होगी ।
मैं श्रीमान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं कि कम से कम भारत भूमि पर रहने का हक मुझे आपने दिया है। आप सर्व शक्तिमान हैं । आप चाहते तो मुझे देश निकाले की सजा भी दे सकते थे । आखिर आप स्वतंत्र भारत के शंकराचार्य है। महोदय, मैं उन दिनों भारत में सक्रिय था जब यहां अंग्रजों का राज था । मैने वह दौर देखा है जब ंिहंदू और मुसलमान एक साथ मिलकर देश की आजादी के लिए लड़ रहे थे । मैं तो फकीर आदमी हूं । गांव-गांव , गली-गली भटकता रहता था । किसी के घर का दाना मिल जाता ले जाकर पकाता और खाकर सो जाता । उन दिनों मुझे यह ख्याल ही नहीं आया कि मैं हिंदू हूं या मुसलमान । मैने श्रद्वा और संतोष से जीवन जीने के लिए लोगों से आग्रह किया । मुझे पता नहीं था कि आपके रूप में मेरा इतना बड़ा हितैषी इस भारत भूमि पर पैदा होगा । मैं उन सभी धर्म-संासदों का भी आभारी हूं जो अखाड़े के नाम से जाने जाते हैं । इन अखाड़ों ने अपना कीमती समय निकाला और मुझ जैसे नाचीज पर बहस की इसके लिए मैं तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूं । मैने सुना है कि समाज में दुराचार अपने चरम पर है। अकेली लड़की का घर से निकलना कठिन हो रहा है। आप सभी अखाडि़ये सांसदों ने इसके लिए भी जरूर जनचेतना अभियान चलाया होगा । आपने कम से कम हिंदू समाज को दुराचार के विरूद्ध; अवश्य ही चेताया होगा। उसकी खबर मुझ जैसे पाखंडी को नहीं मिली । राजनीतिक भ्रष्टाचार भी अपने चरम पर है। जनचेतना भ्रमित है । आप संतों ने अवश्य ही इसे संज्ञान लिया होगा । जनचेतना फैलाने और उसे सुमार्ग पर लाने का प्रयत्न अवश्य ही किया होगा । आखिर जिस देश का अन्न आप बिना उपजाये खा रहे हैं । जिस देश की माटी में बिना पसीना बहाये रह रहे हैं । जिस समाज के चढ़ावे पर जिंदा हैं । उस समाज के प्रति इतने कत्र्तव्य तो आपको याद ही होंगे ।
महोदय , आजीवन मैं नहीं जान सका कि मेरा धर्म मानवता के अलावा भी कोई है । आपने ज्ञात कर लिया । मैं हैरान हूं कि अचानक आपको मेरे प्रति इतना स्नेह कैसे उमड़ पड़ा । आपने मेरे आचार-विचार , आहार-विहार सब पर शोध कर डाला । यह शोध यदि इष्र्यावश है तो श्रीमान आपको सूचित कर दूं कि मैने कभी संचय की प्रवृति को प्रश्रय नहीं दिया । मेरे मंदिरों में जो अक्षय कोष जमा हो रहे हैं । उनके प्रति मेरी जिम्मेवारी नहीं है। मैने अपने जीवन में भिक्षावृति की । आज की सामग्री भी कल के लिए नहीं रखी।
मैं देश की सरकार के प्रति भी आभार व्यक्त करता हूं जो तमाशबीन है। राजनीतिक संसद से भी बड़ी धर्म संसद बन गई है । अंत में, सभी अखाडि़ये धर्मसांसद देश में फैले तमाम अंधविश्वासों और समस्याओं के प्रति भाी इतनी एकता दिखायेंगे इसी आशा के साथ ।
आपका शुभचिंतक
साईंनाथ
शशिकंात सिंह ’शशि’
skantsingh28@gmail.com
7387311701
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